बृहस्पतिवार, 1 मार्च 2012


इन   अंधेरों   में    भी    कमी  होगी 
सुबह      आएगी,     रौशनी     होगी 

मैं   ने   माना   के  आज   तन्हां   हूँ
कल    मेरे    साथ    जिंदगी    होगी   

ख्वाब    बिखरें    है   सूखे  पत्तों  से
फसले   गुल  पास    आ   गयी होगी 

याद   आ   जाओ   दिल  बहल  जाए 
वरना    हम    होगें     बेकसी   होगी 

तुमने  दी    थी    शराब   समझा था 
क्या   पता   था  के  तिशनगी  होगी 

सुबहें    होगी    उतनी   ही नजदीक 
जितनी    बिस्यार    तीरगी    होगी  
-----------------------------------------
Tishnagi= Pyas; Subhe nau= nai subh
Bisyaar= zyadah (YahaaN par 'ghani'
Tergi= andhera 
 ------------------------------------------


 (अखतर किदवई )

9 टिप्पणियाँ:

  1. बहुत बेहतरीन और प्रशंसनीय......

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  2. "याद आ जाओ, दिल बहल जाए-
    वरना हम होगें, बेकसी होगी".

    वाह !!! , बहुत खूब..... सादर.

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  3. सुबहें होगी उतनी ही नजदीक
    जितनी बिस्यार तीरगी होगी
    इसी इंतज़ार में बुरे से बुरा वक़्त कट जाता है....

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  4. अच्छी बेचैनी ।

    अब कृपा हो ही जाए ।।

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  5. ख्वाब बिखरें है सूखे पत्तों से
    फसले गुल पास आ गयी होगी ....बहुत खुबसूरत शेर .....

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  6. ख्वाब बिखरें है सूखे पत्तों से
    फसले गुल पास आ गयी होगी
    ग़ज़ल के हर शे’र में एक सुंदर अहसास का पिरोया जाना इस ग़ज़ल की खासियत है।

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं