शुक्रवार, 25 मई 2012

ग़ज़ल

जिस जुनूं ने नक्श की थी कल तेरी तस्वीर दिल पर
लिख रहा है अब वही इक खूँचकां  तहरीर  दिल   पर

तुम तो बाद अज़ मर्ग जन्नत के लिए सजदा नशीं हो
हमने याँ जन्नत बना ली रखके बस एक तीर दिल पर

खुदपरस्ती   जब  हो   मज़हब   खुद्सरी     ईमान  हो
बंध सकेगी किस तरह आखिर कोई ज़ंजीर   दिल  पर

कल मेरी बेख्वाब आँखों से जो डर कर बह गया था
लिख रही है इक तड़प उस ख्वाब की ताबीर दिल पर.

( अखतर किदवाई)
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खूँ चकां =जिस से खून टपक रहा हो
बाद अज़ मर्ग = मौत के बाद
सजदा नशीं हो = सजदा कर रहे हो
खुदपरस्ती =अपनी पूजा करना / खुद को सबसे अच्छ /बड़ा मानना
खुद्सरी = अपनीही करना / अपनी जिद पूरी करना

रविवार, 13 मई 2012

ग़ज़ल

 जाम बकफ हो नग़मासरा  हो - मौसम का कुछ हक़ तो अदा हो
अब सहरा हो अब दरिया हो -प्यास हो अमृत हो तुम  क्या हो ?

दर्द  की  लाख   दवाएं   देखीं    बेदर्दी    की   कोई  दवा  हो
अपनी मेहनत  पूरी करना आगे भाग में जो लिक्खा हो

सूखी   धरती  गीली  आँखें  काश  ख़ुदा  भी देख रहा हो
किस्मत कतराती है जैसे बिल्ली  ने  रस्ता   काटा  हो

आधी दुनिया  खा  जाओगे  अच्छा जैसे  तुम  ही  ख़ुदा  हो
धड़कन धड़कन ख़्वाब सजाए दिल की जैसे यही सजा हो

जुग बीते  अब  बाहर  झांको  शायद  सूरज जाग गया हो
तुम  तो  ऐसे  झूम  रहे  हो  जैसे  अखतर  ग़ज़ल सरा हो
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 जाम बकफ= हाथ में जाम लिए हुए 
नग़मासरा  होना =नगमा /गीत गाना 
 ग़ज़ल सरा होना = ग़ज़ल पढना 


  (अखतर किदवाई)

बृहस्पतिवार, 3 मई 2012

ग़ज़ल




हमने साहब  ना   लनतरानी   में  ना  हिकायात  में  गुज़ारी     है
बस  निभाया  है    मसलके  रिंदी ,  बस  खराबात   में  गुज़ारी  है .


उम्र  गुजरी  के  हँस के बोला  था  कोई  हमसे  की काट  दो यूं  ही ,
बात  का  पास  हमने  रक्खा  है , बात  की  बात    में   गुज़ारी  है

महफिले  रंगोबू  के  नाम  गई , थोड़ी जामो  सुबू  के  नाम   गई ,
हाँ  कुछ  इक  आरज़ू  के  नाम  गई ,इन ख़ुराफ़ात  मे  गुजारी है

प्यार  की  छाँव में  गुजारी  है , दर्द  के    गाँव    में  गुज़ारी   है
दोस्ती , दिलबरी  वफ़ा  केशी के   मुज़ाफ़ात    में   गुज़ारी    है

कोई दाना  कोई अमीर  हुआ , कोई शेरो  सुखन  में  मीर हुआ
अपना  जीना  मगर  नजीर  हुआ  ऐसे  हालात  में  गुज़ारी  है

   -जून -2010)


लनतरानी= बड़ी बड़ी  बातें ;
हिकायात = कहानियाँ  (कहानियों  जैसे  हालात  में )
मसलके रिंदी - पीनेवालों /रिन्दों  का  चलन
खराबात = मधुशाला
पास = लिहाज़
जमो  सुबू - प्याला  और  सुराही
खुराफात = बेकार  की /बेहूदा  चीज़ें /बातें
वाफकेशी = वफादारी ; मुजाफात = सम्बंधित  वस्तुएं /स्थल
दाना - विसे ; अमीर / दौलेतमंद / प्रमुख
मीर  =लीडर / उर्दू  के  एक  बहुत  बड़े  शायर
नजीर =उदाहरण 

बुधवार, 25 अप्रैल 2012

ये माना  हर  समंदर  का  कहीं  साहिल  तो  होता है.
उबलते  पानियों में    तैरना  मुश्किल   तो  होता  है.

मैं  हर  वादा -शिकन , हर  बेवफा  की  बात  करता  हूँ ,
जहां  पत्थर  समझते  हो  वहाँ  एक  दिल तो  होता  है.

( वादा - शिकन = वादा तोड़ने  वाला .)




अखतर किदवाई
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सोमवार, 9 अप्रैल 2012

ग़ज़ल

ये दस्ते    नाज़    बढ़ा है जो दोस्ती के लिए
कभी किसी के लिए है कभी किसी के  लिए

किसी की मीनाबदस्ती जवाज़े तिश्नालबी
कोई निगाहे करम   जिंदगी  किसी के लिए

ये   बेक़रार   रवानी    ये    बेहिजाब    तड़प
ज़रूर कुछ तो समन्दर में है नदी के   लिए

है दिल में लौ तो सलामत पा होश बाकी है
ख़ुदी   सम्भाल    रहे    है  सुपुर्दगी के लिए

हिसाबे सूदो ज़ियाँ   इश्क़   में  नहीं करते
फ़ना तो शर्त है खूबाने ज़िन्दगी के लिए

सनाए   माज़ी से    बोझल    हमारे ज़हनों   में
न कल के वास्ते कुछ है न कुछ अभी के लिए

तुम्हारी फ़हम के   चर्चे   सुने है  हम   ने   भी
पा कुछ अना भी जरूरी    है   रहबरी  के लिए

शिक्स्तपाई      न    देखो   मेरा   जुनूं       देखो
जो   वसवसों    को   जलता   है रौशनी के लिए

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दस्ते  नाज़ = नाजों  वाला  हाथ / मुबारक  हाथ
मीनाबदस्ती=मदिरा देने के लिए हाथ में सुराही होना
जवाज़े  तिश्नालबी = प्यास  का  औचित्य / कारण .
रवानी=बहाव

बेहिजाब=बेपर्दा

सूदो ज़ियाँ =नफा और नुक्सान

खूबाने जिंदगी =जिंदगी की अच्छी चीज़े

सनाए माज़ी = बीते दिनों/past की तारीफ़

फ़हम=सूझ बुझ

अना= self respect

रहबरी =leadership

वसवसों =हिचकिचाहटों

मंगलवार, 27 मार्च 2012

ग़ज़ल




दीजे हर दर्द को  मत  मेरी    रिहाइश    का  पता 
खुद नहीं देते अगर अपनी   निवाज़िश  का पता 

अब के सावन  में झड़ी   फूटेगी  बस   आँखों  से 
धूप ही धूप है ,  बादल  का न    बारिश  का पता  

तेरी    चौखट    पे   सजै थे    जो    सजदे  उन को 
लग न जाए तेरे इस   रहम की साज़िश  का पता 

अब वो तोलेगे  वो परखेंगें मेरे   फ़न को  ,जिन्हें 
मेरी मेहनत की ख़बर है ना तो काविश का पता

वो भी   एक   राज़   था  खुलता  भी तो कैसे खुलता 
उन को भी लग ना सका अर्ज़-ओ-गुज़ारिश का पता 

अखतर किदवाई
(08-08-2004)

( Kaavish= Effort/Endeavour
Arzo guzaarish-Request)





बुधवार, 21 मार्च 2012

ज़िन्दगी तेरी तल्खी गर शराब जैसी है ,
प्यास मेरी कब कम है, बेहिसाब जैसी है .

सच तो ये है जानेमन हम भी एक हस्ती हैं ,
हाँ मगर यह हस्ती भी बस हबाब  जैसी  है .

होश में या नशे में कर तो ली थी कल तौबा,
आज फिर मेरी नीयत  क्यूं  खराब जैसी है ?

प्यास है या बेजारी क्या है जो उन आँखों में
अब सवाल  जैसी है , अब  जवाब  जैसी  है .

फिर वह आग सी ख्वाहिश , फिर तड़प वह मीठी सी
वह    जो   रेग   लगती   है ,वह   जो   आब   जैसी  है .
    
सर्वक़द      इरादे    भी       इससे     हार     जाते    हैं
प्यास   मेरी    आँखों   की       शहरेख्वाब    जैसी   है
              ( हबाब = बुलबुला )    .
          
                ( रेग = गर्म   रेत)
                    ( आब = शीतल  पानी ) 
   (सर्वक़द= बहुत ऊंचे ;     शहरे ख्वाब  =सपनों का नगर )
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अखतर किदवाई